इंसान सा हूँ , इंसानियत से शर्मिंदा हूँ
मैं अगली सांस के आने तलक जिंदा हूँ
बजता हूँ ग़लत फहमी के साथ
बड़े जोर ओ ज़बर से
साज नहीं साज़िन्दा हूँ
चलता हूँ तन्हाई में तो लगता है परिंदा हूँ
तौबा की हर बार ..हर बार आइन्दा हूँ
सूफियों के वेश में खूंखार दरिंदा हूँ
दर असल ...
मैं अगली सांस के आने तलक जिंदा हूँ
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