कितनी बार बासी पड़ते हैं,
कितनी बार मुरझा जाते हैं।
यह दोस्त यार यह रिश्ते,
चांद से दमकते चांद से गुम जाते हैं।
a blog by o p rathore
रात का इंतज़ार दिन से मिलने को
अंधेरों से होकर गुज़रता है
दुश्वारियों से बीतता है
कभी तुमने सर नहीं लगाया कंधे से मेरे
जब हम जा रहे थे मैं ड्राइव करता था
आज समझ आई वजह
तुम ढूंढ नहीं पाई प्रेमी मुझमें
मैं पति बना रहा
बैल बना रहा गृहस्थी के हल का
जिंदगी प्रेमी को चाहती है मगर ब्याहती पति से है
यह विसंगति जी है तुमने हमने ।
वो चाहे तो क्या मुझे ख़ुश नहीं कर सकता ॽ
उसे पता है ख़ुश लोग उससे छूट जाते हैं
सरपरस्ती में रहने वाले भी तो ख़ुश रहते हैं।
Hymns for him
और धुंध में खो जाते हैं
वही हैं मेरे गांव के लोग
उन्हीं के वहां से आया हूं मैं
वहीं उदासीन मोहल्ले में मेरा घर पड़ता है