
सफ़र मेरा चलता रहे
तेरा रुके
क्या फर्क पड़ता है
मेरी डगर खुली रहे
तेरी डगर हो बंद
क्या फर्क पड़ता है
मेरे हिस्से में ख़ुशी हो
तुझे मिलें अश्क
क्या फर्क पड़ता है
मेरा नाखून तक
बचा रहे
ट्रेन आधी चाहे पूरी
डूब जाए
क्या फर्क पड़ता है
तू जो मेरे काम का नहीं
और जो तुने की हाय या बाय
क्या फर्क पड़ता है
मैं खोया हूँ खुद में इतना
तू है भी या नहीं
किसी को
क्या फर्क पड़ता है
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